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Hymn No. 2582 | Date: 01-Jun-2002
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असलियत के जो दिल तुझको चाहता है, तो फिर मन क्यों भागता है यहाँ वहाँ
असलियत में जो दिल तुझको चाहता है, तो फिर मन क्यों भगाता है यहाँ वहाँ।
वो तो प्यार मांगता है, जो तेरी सोहबत ओर रहमत से मिलती है जहाँ को।
दशा बदलती जा रही है दुर्दशा में, फिर भी तैयार ना हूँ समझौता करने को।
आस है दिल में आज नही तो कल मदत आयेगी जरूर तेरी ओर से।
झूठी है या सच्ची, पर पूरा विश्वास है इस धोखा खाये हूये दिल को।
जिल्लते नजाने कितनी उठायी, पर शर्मंदिगी न आयी कभी मन में।
दुनिया ओर कर्म मेरे बुने गये हैं, इक ताने बाने से जो खेल खेलते है मुझसे।
हंसी आती है जानते हुये सब कुछ, कब तू अनजान बना रहेगा संतोष मेरे।
फरियाद ना करता हूँ दिन में इक बार दिल से जरूर तुझे याद करता हूँ।
अंत कर दे तू मेरे मन को तेरे महामन में, अंत हो जायेगी मन की सारी व्यथा की।
- डॉ.संतोष सिंह
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हे माँ, हें माँ, मदद कर तू मेरी, असहाय हो रहा हूँ मन के आगे।
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दिल ही दिल में चाहता हूँ न जाने तुझे कितना, हो जाता है बयाँ करना मुश्किल।
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