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Hymn No. 2583 | Date: 01-Jun-2002
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दिल ही दिल में चाहता हूँ न जाने तुझे कितना, हो जाता है बयाँ करना मुश्किल।
दिल ही दिल में चाहता हूँ न जाने तुझे कितना, हो जाता है बयाँ करना मुश्किल।
अरमा मन में न जाने कितना संजोयां हैं, वख्त के आगे पूरा करना हो जाता है मुश्किल।
दिल पे घाव न जाने कितने हैं, ठीक हो पाना हो जाता है मुश्किल तेरी यादों में विचरते विचरते।
कहने को तो बहुत कुछ है पास मेरे, खंगालने पे कुछ नहीं रहता है हाथों में अपने।
सपनो को बहुत ही संजोया था मन ही मन में, साकार कर न पाया दूर रहके तुझसे।
बातो ही बातों में सिखाया बहुत कुछ तूने, सीख न पाया कुछ भी न जाने क्यों तेरे पास रहते।
आशिकी का दौर न जाने कितनी बार आया गया, फिर भी खेल खेला तूने मिल मिलके बिछुडने का।
सौदागर न थे हम कोई जो जान लू कीमत तेरी, बेशकीमती क्यों तूने इस गरीब को न अपनाया।
लोगों ने तो न छोड़ा था जब चाहे तब लुटा, अरे तूने ऐसे स्वभाव को क्यों चस्पाया।
जिंदगी जीने की ललक में जिंदा ही मरते गया, मरता देखके तूने क्यों न हमको जिंदा किया।


- डॉ.संतोष सिंह