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Hymn No. 2584 | Date: 16-Jun-2002
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माँ मेरी भी सून लो कभी कभार, फंसा हुआ हूँ अपने बनाये चक्रव्यूह में जरूर।
माँ मेरी भी सून लो कभी कभार, फंसा हुआ हूँ अपने बनाये चक्रव्यूह में जरूर।
देने को दिया है तूने सब कुछ, फिर भी तोड़ नहीं पा रहा हूँ मन के व्यूह को।
जितना ही आगे बढ़ता जाऊँ, उतना ही ना सूझे तेरी ओर पहूँचने का मार्ग।
गुहार दिल तुझे ना लगाये तो, तू ही बता कौन आयेगा मदद को मेरी।
कामरूपी दलदल में डूबा हूँ गले तक, इच्छारूपी जंजिरों ने बांध रखा है रोम रोम को।
अंतर का जोम् कितना भी पूकारे, मदद खूद की करना चाहके कर भी ना पाऊँ।
ऋंदन करता है कई बार अंतर मेरा, माँ क्या तू ना बनेगी तारन हार मेरी।
तुने जो ना हाथ बढाया उद्धार के वास्ते, तो मां कैसे सन्मार्ग के रास्ते पे।
माँ जो भी कर अब जल्दी कर, तेरे प्रेम के वास्ते जब भी तडपा हूँ बहुत तड़पा।
कृपा तेरी मुझपें तो बहुत पहले से है, पर कमियों के जाल ने रोक रखा है मुझे।


- डॉ.संतोष सिंह