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Hymn No. 2586 | Date: 27-Jun-2002
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अंतहीन मुलाकात चाहता हूँ तुझसे, अंतहीन प्यार चाहता हूँ तुझसे।
अंतहीन मुलाकात चाहता हूँ तुझसे, अंतहीन प्यार चाहता हूँ तुझसे।
ऐ अनमोल इस बेमोल को मिटाके, हर हमेशा के लिये पाना चाहता हूँ तुझे।
बदनामियों का सरोकार है मुझसे, पर तेरा प्यार पैरवीकार है मेरा।
तड़पा ना हूँ जन्नत के वास्ते, गर तड़पा हूँ तो तेरे प्यार के वास्ते।
मारा हूँ अपने फितरतों का, कदम दर कदम राह रोके खड़ी है किस्मत मेरी।
कुछ है मेरे पास तो वो यादें तेरी, जिनमें गुम होके जीता हूँ सुकुन भरी जिंदगी।
बहुत खेला शब्दों से, परवाह न किया तेरी रहस्य भरी बातों का।
बीते हुये वख्त की जो पड़ी चोट दिल पे, तो हर पल कचोटता है अंतरआत्मा को।
फिर से गुम हो जाना चाहता हूँ, उलफतों की दुनिया में अब ना रहना चाहता हूँ।
जहाँ धोखा देता रहा हूँ अपने आपको अपने आप से, वहाँ रहके अब ना रहना चाहता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह