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Hymn No. 2587 | Date: 01-Jun-2002
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प्यार का राही हूँ, प्यार के सिवाय कैसे रूचे कोई ओर राह।
प्यार का राही हूँ, प्यार के सिवाय कैसे रूचे कोई ओर राह।
भटका होऊँगा कुछ पल के वास्ते, पर ना जा सकता हूँ हमेशा के लिये।
बहुत सताया तेरे दिल को, प्यार के नाम पे चुभाया कांटे अनगिनत बार।
दर्दको तू सहता रहा मुस्कुरा के, जानके अनजान बना रहा तेरी पीड़ से।
फिर भी तूने दिया वो सब कुछ, जिसके लायक ना था मैं तब।
रब सजा देनी है जो वो तू दे दे, पर मुझसे कभी तू दूर न होना।
उधार रहा है बहुत कुछ तेरा, करुंगा पूरा बिना देर के प्रयासो से अपने।
हर अकर्मण्यता को छोड़के भरूंगा तेरे सपनो में रंग पुरुषार्थ से अपने।
झुंठा पड़ा होऊँगा कई बार, पर अब ना पड़ने दूंगा झूठा प्यार को अपने।
जो ना कर सका था वो कर दिखाऊँगा परम प्यार से तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह