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Hymn No. 2588 | Date: 27-Jun-2002
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इंतजारी का खेल शुरू हो गया जिंदगी में, अब तो हर पल तड़पना है, जीतेजी मरना है।
इंतजारी का खेल शुरू हो गया जिंदगी में, अब तो हर पल तड़पना है, जीतेजी मरना है।
मुलाकातों का दौर होगा ख्वाबों में, या यादों के पलों में चुपके से घुसके दिल को मिलना होगा।
दुनिया के संग माया का खेल खेलते हुये हंसते हंसते रोना होगा, अपनी उलफतों का उलाहना खूद को देना होगा।
सताते वक्त किया न था ख्याल उसके हाल का, मुस्कुराहटों के पीछे छुपे आसुओं को देखना चाहा न कभी।
अब तो हर जिल्लत को नजरें झुकाके सहना होगा, बदनाम होके इक बार फिर से वफाकी कसमें खाना होगा।
कोई कोना न बाकी है, जहाँ दाग लगा न हो बेवफाइ का, फिर भी मिन्नतों का दौर जारी रखना होगा।
मर मरके मरा कई बार, पता नहीं पर इस बार मरते दम तक आशिकी का प्राण दिल में फूंकना होगा।
जितना चाहा उससे ज्यादा नवा जता रहा वो, इसी बात का मन में फायदा उठाता रहा बार बार।
आयत किया ऐसा चारों खाना चित्त करके छोड़ा, छोड़के जब जान चाहा मुस्कुराके वो फिर से कुछ देना चाहा।
हाय रे बेहया मन अब तो रहम कर, सौंपके उसके हाथों में सब कुछ गूम हो जा चुपचाप उसके ख्वाबों में।
- डॉ.संतोष सिंह
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