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Hymn No. 2589 | Date: 27-Jun-2002
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दूर दूर तक देखता हूँ, तेरे सिवाय कोई साथ नजर नहीं आता।
दूर दूर तक देखता हूँ, तेरे सिवाय कोई साथ नजर नहीं आता।
जी तेरे बगैर जिंदगी जीने का, कोई कारण नजर नहीं आता।
उसपे भी भारी है किस्मत की लकीरें, जो मिटाये मिटती नहीं है जिंदगी से।
अंदाज कैसा है कहना बहुत मुश्किल है, आज सुकुन है तो कल न जाने कौन सी मुश्किल है।
हाथों पे हाथ धरे बैठा हूँ, इस इंतजार में कभी तो होगा कुछ ना कुछ।
कुछ होने के इंतजार में, जो कुछ भी है पास मेरे वो लुटाये जा रहा है।
जिंदगी के हर अंदाज पे, नजरें झुका के खुद पे मुस्कुराते बैठा हूँ।
कभी कोई करता है तारिफ, तो कभी कोई हंसे, चुपचाप साथ दिये बैठा हूँ।
ज्ञान ओर अज्ञान के बीचों बीच, इंतजारी के इम्तहां से गुजरता जा रहा हूँ।
अथक प्रयासों के बावजूद, प्रभु की बात किये बैठा हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह