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Hymn No. 2592 | Date: 29-Jun-2002
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धीरे धीरे समय की नाँव चली, ऐसी चली बीत जाने पे याद न आयी।
धीरे धीरे समय की नाँव चली, ऐसी चली बीत जाने पे याद न आयी।
बहुत चाहा समय रहते कर लू जतन, उतना ही सरकती गयी हाथों से।
जब हाथों में था तो ऐसा लगे कि जा जाके जायेगी ना कभी पास में मेरे।
रिस्ती रही छन–छन के, रिस जाने पे ही ना रहने का ध्यान आए हमको।
समय रहते जो ना कर सका, बीत जाने पे याद आने का क्या फायदा।
वायदा तो बहुत किया था कर जाने का, समय से पहले कर न पाये करने की शुरूआत।
औरों को कहाँ जरूरत थी, जरूरत तो ये ना मेरी थी, ये तो मांग थी मेरे अंतर की।
जब तड़पा तो देर बहुत हो चुकी थी, सुबह का भुला सांझ को लौटे तो ना कहलाये भूला।
समय की बात थी, समय रहते जो दिल पहचान गया, यही तो समय की मांग हैं।


- डॉ.संतोष सिंह