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Hymn No. 2595 | Date: 02-Jul-2002
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प्यार मेरा गुम हो गया है, करमों के बादल में।
प्यार मेरा गुम हो गया है, करमों के बादल में।
चारो ओर छा गया है, घनघोर अंधियारा इच्छाओं का।
दूर दूर तक फैला हुआ है जाल, काल के गाल में समेटने के वास्ते।
खो गया हूँ अपने बनाये हुये, मन के चक्रव्यूह में।
धरा था साथ चढ़ते सूरज का, पर बंद आंखो से चला था उसके पीछे।
दास्ताँ बड़ी अजीब है, पाते पाते खो रहा हूँ जीवन के अनमोलपन को।
कहना मुश्किल है, लगता है कहीं कुछ चूक सा गया हूँ।
वख्त रहते उठी जो आवाज अंतर में, सुन ले तू दिल की बात।
इक बार फिर से प्रयासों का दौर शुरू हुआ, भूलाके हालातों को।
दिन बदलते देर ना लगे, जो हम थे फिर से उसकी कांखा में।


- डॉ.संतोष सिंह