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Hymn No. 2601 | Date: 30-Jul-2002
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निरंतर एक ही मांग है, उसे दिल की कहो या मन की वो तेरी है, तेरी है।
निरंतर एक ही मांग है, उसे दिल की कहो या मन की वो तेरी है, तेरी है।
मांग को मेरी समझ से भरी कहो या नासमझ से भरी वो तेरी है, वो तेरी है।
बद से बदहाल हालात में दोहराता हूँ पुरी हो चाहे या ना पूरी हो वो तेरी है, वो तेरी है।
लायक नहीं हूँ तो क्या, लायकियत पाना चाहता हूँ तेरे वास्ते वो तेरी है वो तेरी है।
रहते हूये रह न पा रहा हूँ, तेरे बिना होके जीना चाहता हूँ पर वो तेरी है, वो तेरी है।
सिलसिला चलाये जा रहा हूँ, वो खत्म हो या ना हो, वो तेरी है, वो तेरी है।
बाते बनाना कहो या दिल को लुभाना पर मांग न है दौड़ने वाला वो तेरी है, वो तेरी है।
हंसके चुपचाप विरह के आंसुओं की पिये जा रहा हूँ पर मांग दोहराये जा रहा हूँ वो तेरी है।
आगाह बहुत किया फिर थामा दामन शोंलो का, छोड़ने के बदले मांग दोहराये जा रहा हूँ वो तेरी है, वो तेरी है।


- डॉ.संतोष सिंह