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Hymn No. 2608 | Date: 29-Aug-2002
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हम न है हमसे, ना जमाने से, पिया जो जाम उल्फत का।
हम न है हमसे, ना जमाने से, पिया जो जाम उल्फत का।
संग रहके उनके, दूर थे दुनिया से, फिर भी कोई न साथ था हमारे।
किस्सा बड़ा अजीब था, नाकामियों का जो चारों तरफ जोर था।
समर्थ के पास रहके, असमर्थता के पाले में जिंदगी जिये जा रहे थे।
जो तरसते थे कल को साथ के, आज बचते है हमारी परछायिंयों से।
सुकूँ मन का पल पल लूटता जा रहा था, पर दिल हार मानने को तैयार न था।
पीड़ा थी तो मन को, सच पूछों तो हरपल कचोटती थी दिल को।
मुंख पे हंसी थी तो हरदम तो क्या से, दम निकाल लेते थे अपने यार का।
जब से लिया था श्वास, किसी ओर के दम पे जिया था जिंदगी को।
आज भी बेदम है, पर चाहता हूँ तेरा हमदम बनके गुजार लूं जिंदगी को।


- डॉ.संतोष सिंह