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Hymn No. 2609 | Date: 30-Aug-2002
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यह महफिल है ऐसी, यहाँ सब कुछ छोड़के आना पड़ता है।
यह महफिल है ऐसी, यहाँ सब कुछ छोड़के आना पड़ता है।
बातों ही बातों में जीवन भर का कमाया हुआ लुटाना पड़ता है।
तलवार का धार पड़ जाये कुछ देखके, ऐसी राहों पे हंसते हुये चलना पड़ता है।
गम के पलों में आनंद का जश्न, बिन हिचकिचाये मनाना पड़ता है।
मौत आ भी जाये तो, जुनून में प्यार के बहके चूम लेना पड़ता है।
इस महफिल का नशा है ऐसा, जहा सब कुछ लुटाके चैन की बशी बजानी पड़ती है।
होश उड़ जाते है यहाँ अच्छें अच्छों का, गुरू का जांबाज बाजी मार ले जाता है।
गलती नही दाल किसीकी, सिरफिरों को मस्ती आती है जो हर हालात में।
कोई क्या सतायेगा, जो खुद को सताता रहता है प्यार के नाम पे।
दोष देता नहीं है किसीको, चुपचाच रस्म निभाता है कहानी प्यार की अपने अंदाज में।


- डॉ.संतोष सिंह