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Hymn No. 2612 | Date: 16-Aug-2002
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हैं.. कैसे कहूं बातें दिल की, जो मिलते नहीं शब्द।
हैं.. कैसे कहूं बातें दिल की, जो मिलते नहीं शब्द।
खामोश निगाहे देती है तब जवाब, पढ़े या ना पढ़े कोई दिलदार।
मिटती हुयी जिंदगी में हौसला जो कायम है तेरे प्यार से।
मूक होके जो देखता हूँ हर दम अपने आपको बेदम होते हुये।
फिर भी नजराना देना चाहता हूँ, तेरी अपरमपार सत्ता को।
नाच़ीज दिल से दिल की हर बात क्या करना चाहता है तुझसे।
बातों का अंत हो कैसे, जब करता हूँ बेपनाह प्यार तुझसे।
बता कैसे न बनाऊँ तुझे मेरा हमदम, जो तेरे दम से टिका हो सारा जहाँ।


- डॉ.संतोष सिंह