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Hymn No. 2616 | Date: 29-Sep-2002
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जिंदगी में आये लहर एक के बाद एक, रुकने का नाम न लें।
जिंदगी में आये लहर एक के बाद एक, रुकने का नाम न लें।
कोई हो खुशियो से भरी, तो कोई लिये हो अम्बार दुःखो का।
कृपा है मालिक का, चाहके भी रुक ना पाये गुजरते जाये सारे।
बेमानी होता जा रहा है सब कुछ, जो मन में संतोष जन्म लेता जाये।
खेल है ये अजीब, खेलते खेलते खेल बन गये है हम सब।
गुरू की कृपा से। बिना खेले खेलना सीख जाये कोई एक से।
सागर है तो लहरो का आना जाना लगा रहेगा, पर वो ज्यों का त्यों बना रहेगा।
व्यवहार में तो सब कुछ होता रहेगा, अंतर को जो तू उससे जोड़के रखेगा।
चाहके भी ना कुछ खेल पायेंगा, निजआनंद की मस्ती में तू जीत जायेगा।
संसार के व्यवहारों के पूरा करते, तू आत्मआनंद में निरंतर रम जायेंगा।


- डॉ.संतोष सिंह