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Hymn No. 2618 | Date: 06-Oct-2002
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माना मेरे आसुंओं का कोई मेल नही, न ही मेरे बोल का कोई तोल।
माना मेरे आसुंओं का कोई मेल नही, न ही मेरे बोल का कोई तोल।
जो भी मिला है तेरी कृपा से, पापों से भरा मन इस जिंदगी को।
खेल समझा था, हर चीज को, तू हो या जीवन के सारे रिश्ते को।
खेलता रहा नासमझ बनके, जब पड़ाr मार तो गुहार लगायी तुझको।
बहुत सीखाने की कोशिश, पर न सीखने की फितरत जो है हमारी।
वाह रे प्रारब्ध मेरा, प्रभु तेरे रहने पर भी मार खाँयी प्रारब्ध की।
कैसे कैसे किये होंगे गुनाह तब, अ भी गूनाह करने से मन बाज न आये।
इंसा के भेंष में रहके करू कर्म ऐसे, शर्मा जाये हैवानियत मूझसे।
ऐं दयावान कर कृपा इतनी, भूले से भूलें दिल मेरा तुझको कभी।
तेरे प्यार का हो जाये इतना असर, कसर न रहे जिंदगी को प्यार से जीने में।
- डॉ.संतोष सिंह
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मग्न हृद्य है, कर्मों की गहरी खाई, तेरे सिवाय कौन पार लगाये इस बुझी हुयी जिंदगी को।
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ऐ आकाश, बात दे पता तू मेरे परम पिता का।
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