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Hymn No. 2619 | Date: 06-Oct-2002
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ऐ आकाश, बात दे पता तू मेरे परम पिता का।
ऐ आकाश, बात दे पता तू मेरे परम पिता का।
ऐ हवाओं तुम बहा ले चलो मस्ती में मेरे परम पिता के पास।
ऐ जमी सीखा दे सब कुछ सहते चुपचाप प्रभु का गुंणगान करना।
ऐ बरखा बता दे बिना कहे कहीं भी बरस के सबको आनंद से तरबतर करना।
ऐ वादियाँ कैसे रहती हो इतना सज धजके मोह लेती हो हर मन को।
ऐ समदर कैसे हो तुम इतन गहरे कितना भी दे कोई समेट लेते हो अपने अंदर।
ऐ आग बिना पड़े मोह में तुम कैसे कर देती हो अपने पराये सारों को ख्वाब।
रहे हो सदा तुम सब प्रभु के प्यार में इसलिये समाया है वो कण कण में तुम्हारे।
समाने को तो समाया है प्रभु इस तन में, पर भान नहीं है उसका इस मन को।
उतारे न उतरे ऐसे छाप दे दो दिल पे हमारे क्या तन हो या मन कोई हो न पाये जुदा तुझसे।


- डॉ.संतोष सिंह