VIEW HYMN

Hymn No. 258 | Date: 05-Aug-1998
Text Size
दिल ही दिल में बहुत कुछ कहता हूँ तुझसे, यह जानके तू सुनता होगा सब कुछ;
दिल ही दिल में बहुत कुछ कहता हूँ तुझसे, यह जानके तू सुनता होगा सब कुछ;

कहाँ कुद कहना है मुझको अपना, तेरी बातें तूमसे मैं कहता हूँ ।

सुनता भी नहीं हूँ मैं कुछ, कभी – कभी सिर्फ तेरी बात सुनता हूँ ;

मुझको कहाँ कुछ आता जाता, जो तू है बताता वो ही लिख जाता हूँ ।

दलदल में धँसा था गले तक मैं, तेरा सहारा पाके बाहर आया;

ना ही मुझे अब है कुछ कहना, तेरी हर बात बस सुननी है

सब कुछ लेके क्या करूँगा, सब कुछ मुझे दे देना है;

तेरा नाम लेके कुछ ना अहसास करूँगा, हर पल यूँ ही गुजारना है ।

तेरे सिवाय् मैं कुछ ना सुनूँगा, बस तेरे मन की करता रहूंगा ।

जो आग दिल में लगी है, उसमें मैं तन – मन को जला दूँगा;

भला या बुरा कूछ ना सोचना मुझे, करता रहूँ जो भी तेरा नाम लेके।

खोना या पाना से ना है मतलब मुझे, बस चाहिये तेरे श्री चरणों में शरण ।


- डॉ.संतोष सिंह