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Hymn No. 2625 | Date: 11-Nov-2001
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मन के खेलसे बनी हुयी है दुनिया जेल।
मन के खेलसे बनी हुयी है दुनिया जेल।
हमारे दम पे टिका हुआ है जो दुनिया का वजूद।
मौजूद जो कहीं नहीं, वो मौजूद है सब जगह।
ओर जो मौजूद है, वो मौजूद है कही भी नही।
अजीबो गरीब है, मौजूदगी नामौजूदगी का ये खेल।
और जो नामौजूद है, वो कायम करेगे तोला है मौजूदगी को।
खेल चल रहा है, अनंत काल से अनंत काल तक।
बिगड़ है स्वरुप पर दोहराता जाये अपने हाल को।
बंद न हो कभी ये तमाशा, हर बार निभाये अपने अंदाज को।


- डॉ.संतोष सिंह