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Hymn No. 2630 | Date: 05-Dec-2001
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मारा हूँ फितरतों का तो क्या, धुन तो लगी है तेरे प्रेम की।
मारा हूँ फितरतों का तो क्या, धुन तो लगी है तेरे प्रेम की।
बदनाम रहा जिंदगी में तो क्या, नाम लेता रहा हूँ तेरा दिल से।
कमियाँ एक नहीं है कई कई तो क्या, उबरने का जज्बा रखता हूँ तेरी कृपा से।
कहने वाले कहते है बहुत कुछ तो क्या, बुरा लगता नहीं मन को तेरी दया से।
दोषों से भरी जिंदगी की है सारी राहें तो क्या, दोष देता नहीं किसीको तेरे दिये हुये संस्कारों की वजह से।
उलझते है लोग बाग आके खुद तो क्या, मुख फेरके चल देता हूँ तुझे याद करके।
रोम रोम बिंधता है व्यंग्ग बाणों से तो क्या, आवाज आती है अंतर से सुनाये तेरे गीतों की।
कोई करे कितना भी भेद तो क्या, मिलते ही मुस्करा देता हूँ तेरा एक और रूप देखके।
न जाने कितने आयाम गढ़ दिये छोटी सी जिंदगी में तो क्या, मन ही मन बतियाते रहना सिखा दिया जो तूने।
रहूँ दूर चाहे पास या कही ओर तो क्या, पल भर को दिल भुला नही पाता तेरी मोहब्बत को।


- डॉ.संतोष सिंह