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Hymn No. 2631 | Date: 13-Dec-2002
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कैसे बीतेंगे ये दिन, बिताये न बीते दुःखो से भरे ये पल।
कैसे बीतेंगे ये दिन, बिताये न बीते दुःखो से भरे ये पल।
चारो ओर छाया है अंधियारा, कही दूर टिमटिमाये आस की लौ।
अनवरत् प्रयासों का चल रहा है दौर, फिर भी न है कही कोई शोर।
भोर होने में अभी भी है देर, फिर भी इंतजार है हमको किसीका।
जैसे जैसे वख्त गुजरता जाये, उसी के अनुरूप कर्मों का स्वरूप होता जाये।
राह रोके हुये है हजारों, फिर भी मदद करता है तू हर बार।
एक के बाद एक माया के फंदो को कांटते हुये बढते जाये तेरे रास्ते पे।
कोई कहे चाहे कुछ, ध्यान दिये बगैर प्रभु तेरा कहा करते जाये।
परवाह न है अब कुछ कि, होता रहे जो चाहे कुछ भी जिंदगी में।
बीतने को बीतती है जिंदगी, इस बार संजो लेना है तेरी बंदगी में।
- डॉ.संतोष सिंह
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मारा हूँ फितरतों का तो क्या, धुन तो लगी है तेरे प्रेम की।
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बिना पंखो के उड़ते गया समय, बचपन को बुढ़ापे में बदलते गया समय।
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