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Hymn No. 2632 | Date: 12-Dec-2002
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बिना पंखो के उड़ते गया समय, बचपन को बुढ़ापे में बदलते गया समय।
बिना पंखो के उड़ते गया समय, बचपन को बुढ़ापे में बदलते गया समय।
जब जब रोकना चाहा, तब तब श्वासों से फिसलते गया समय।
चारों तरफ शोर था नामचीनों का, पर समय के आगे जोर न देखा किसीका।
संगत करनी चाही कितनी भी किसीने, कुछ समय के बाद समय से पीछे छूटते देखा।
हाय हाय होने लगी मन में, समय को जानके रोम रोम दहलने लगा।
अचानक परम् प्रिय की निगाहों से हुयी बरसात अनुपम कृपा की।
सारे डर को मिटते देखा, दिल से अनायास प्यार के अंकुर को फूटते देखा।
उसी समय समय की प्यार से भरे इशारों पे प्यार बनके नाचते देखा।
तब जाना रहस्य समय से पार जाने का, बिना रुके त्रिकाल हो जाने का।
वही समय आज भी है कल भी है, पर त्रिकाल के आगे मौंन है।


- डॉ.संतोष सिंह