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Hymn No. 2634 | Date: 02-Jan-2003
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प्यार की बात कैसे करूँ, जो प्यार करना न आये।
प्यार की बात कैसे करूँ, जो प्यार करना न आये।
जब भी डूबूँ गमों में, तो दिल को तेरी याद आये।
कैसे कहूं प्यार मेरा है सच्चा, जब खुद को लगे कच्चा।
बहुत चाहा रंग भरना, भरते - भरते वख्त के पटल पे बिखर गया।
दोष न है इसमें किसीका, किस्मत ने जो लिख रखा था।
बेचारे बन गये थे हम, मजबूत थे जो जाल प्रारब्ध के।
बहुत बचना चाहा, हाक हाक के हेकड़ी में कुछ कर दिखाना चाहा।
पता नही कैसे निकलने की कोशिशों में खुद को फंसते पाया।
नीची निगाहों से सिसक सिसक के खुद को दम तोड़ते पाया।
न जाने ऐसी कौन सी कमी थी, जो तेरे रहते खुद को मुरझाते देखा।


- डॉ.संतोष सिंह