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Hymn No. 2638 | Date: 15-Jan-2003
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बड़ी बड़ी बातें करता हूँ, हाँ बड़ी - बड़ी बाते करता हूँ।
बड़ी बड़ी बातें करता हूँ, हाँ बड़ी - बड़ी बाते करता हूँ।
फिर भी तुझे याद करता हूँ, जो दिया हूँ दिल पे जख्म हजारों।
फिर भी तेरी तबियत का तुझसे हाल पूछता हूँ।
तेरी महफिल का सबसे बेकार बंदा हूँ, फिर भी इलाज पूछता हूँ।
थोड़ी सी शर्म होती तो, उठके चल देता हाल देखके तेरा।
अपनी बेशर्मी देखके हैरान होता हूँ, कैसे तेरा हाल पूछता हूँ।
न जाने किस काठ का हूँ बना, जो कुछ भी न हूँ समझता।
ओर जो कुछ हूँ समझ जाता, उसका कोई साकार न करता हूँ।
फितरत है ये मेरी कैसी, जो बदलने के बजाय बदतर होती जाये।
और तो और तेरे खातिर दूर होना चाहूँ, उतना ही तेरे पास पहुंचता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह