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Hymn No. 260 | Date: 06-Aug-1998
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मेरे प्रभु कहते है मुझको, नहीं है भागना तुझको कीसीसे
मेरे प्रभु कहते है मुझको, नहीं है भागना तुझको कीसीसे
जीवन के हर दायित्वों को निभाते हुये, पास मेरे तू आना ।
कर्मों से विमुख होना सबसे बड़ा अपराध है, मिथ्या प्रलाप से तू बचना।
अपने – पराये के बोध से दूर, व्यवहारिक कर्म तू करना ।
थोथी मान्यताओं के घेरें में तू ना बंधना, ना ही कीसी को;
जो दिल को जँचा वो ही सदा करना, मन के पीछे ना भागना,
हित सदा दूसरों का देखना, अहित होने ना देना कीसीका,
करना जो कुछ भी तू दीन – दुनिया के लिये इस हाथ से, तो उस हाथ पता को ना चले
जो भी तू कुछ करना, सौंप देना निर्मल मन से अपने परम् को,
जिसने जो कुछ भी अर्पण किया उसे, पल भर में करता है स्वीकार ।
तू सदा सरल रहना, शांत होके सब कुछ करना;
ना ही डरना कीसीसे, ना ही लडना, जो करना पूछके उससे निडर होके करना ।
- डॉ.संतोष सिंह
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