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Hymn No. 2645 | Date: 01-Feb-2003
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ये कैसा सफर है, जहां चलने पे भी न कटती हो डगर।
ये कैसा सफर है, जहां चलने पे भी न कटती हो डगर।
इम्तंहाँ का दौर गुजरने का न नाम ले, एक के बाद दूजा जो तैयार हो।
इरादे हो कितने भी पक्के, हालातों के आगे टूट जाते हैं रेत बनके।
सकते में आ गया है मन, कल क्या होगा उसका ख्याल कर करके।
फिर भी चलता चला हूँ, तेरे नाम का जाम पीं-पीके थोड़ा-थोड़ा करता रहा हूँ।
रोता नही हूँ कमियों का रोना, बहुत कुछ मेरे अंदर में है तो कुछ दुनिया में।
अहसास है दिल को तेरे प्यार का, गुजर जाऊँगा तेरा होके सारे हालातों से।
जो आज अंतर में छुपा है, वो होगा जगजाहिर तेरी मिसाल बनके।
अब तक जो सहेजा तूने तो आगे खिलेगा कमलवत् कीचड़ में भी रहके।
तेरा नाम जो जुड़ है, मिटके भी करुँगा तेरा ही नाम दुनिया में।


- डॉ.संतोष सिंह