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Hymn No. 2652 | Date: 22-Mar-2003
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बात न है ये इतनी सी, जितनी सी नजर आये जिंदगी में हमको।
बात न है ये इतनी सी, जितनी सी नजर आये जिंदगी में हमको।
शुरूआत हुई है अनादि से, ओर चलता रहेगा खेल अनंत तक।
प्रभु से है उपजे हम, ओर मिल जाना है आज नहीं तो कल प्रभु में।
एक के बाद दूजा पड़ाव, न जाने कितने जन्मों का है ये सैलाब।
चाहके रुक न पाया कोई, जानते हुये भटकता रहा है हर कोई।
जिसे समझा मंजिल, वो निकला मृग तृष्णाओं का समंदर।
तब जाके सहजता ओर सरलता से उठाया, परदा आँखो पर से सद्गुरू ने।
फिर भी आँख मीचे हुये करेगे नाटक हम सोने का, तो कैसे कृपा को पायेगे।
जो हाथों में आज ला रखा है, वो भी पलक झपकते उड़ जायेगा।


- डॉ.संतोष सिंह