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Hymn No. 2654 | Date: 29-Mar-2003
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मंगल करने वाले मेरे पिता, उबार ले मुझे अमंगल परिस्थितियों से।
मंगल करने वाले मेरे पिता, उबार ले मुझे अमंगल परिस्थितियों से।
ये कोई गीत न हैं, ये हालत है चित्र - विचित्र मेरी जिंदगी की।
करुँ मैं कैसे क्या, जितना सोचूं उतना ही घँसता चला जाऊँ।
एक के बाद दूजा न जाने कितने आते जाते है अक्सर पर अब तक न आया कुछ हाथों में।
रोना न रो रहा हूँ, आप बीती सुना रहा हूँ अपनी जिंदगी की।
हंसी न जाने क्यों किस्मत को न भायी, कर्मों के चाबुक से अनवरत् मुझे पीटे।
जख्मों से न कोई नई सीख पाता हूँ, मुर्खों की तरह हंसते हुये आगे बढ़ जाता हूँ।
चलेगा ये खेल कब तक, कब आयेगा संजीदापन तेरे प्यार में तुझमे खो जाने को।
किसी ओर को तो कोई ओर रोके, यहाँ तो खुद को सरापता हूँ भावो के वेग में बहते।
बहुत सह लिया प्रभु अब न रहना है तोरे बिना पल भर, कबूल है कबूल है तेरी सजा।


- डॉ.संतोष सिंह