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Hymn No. 2657 | Date: 04-Apr-2003
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तू चाहे तो मैं गुनगुनाऊँ, तेरे दिल की बात सुनाऊँ।
तू चाहे तो मैं गुनगुनाऊँ, तेरे दिल की बात सुनाऊँ।
न ही फिक्र करूँ खुद की, न ही जिक्र करुँ जहाँ का।
गुनगुनाते गुनगुनाते सिर्फ तेरे प्यार का ही गीत गाऊँ।
लम्हा बनके गुजरे बरस, फलक झपकते खेल खत्म हो जिंदगी का।
सच पूछो तो मन नहीं है भरता, एकटक तुझे यो ही देखता रहूँ।
दीवानगी की सारी सीमाओं को तोड़ते हुये तेरे प्यार में खोता चला जाऊँ।
अब तक क्यों रुका हुआ हूँ, अंतर का प्यार कब सैलाब बनके उमड़ेगा।
गाफिल होता हूँ जमाने से, तेरी याद आते ही पगला जाता हूँ तेरे प्यार में।
ये कैसी विचित्र दशा है, किस बात की प्रियतम इतनी लंबी सजा है।
कब आयेगा वो पल, जब मिलते ही बिछुड़ना न होगा।


- डॉ.संतोष सिंह