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Hymn No. 2661 | Date: 25-Apr-2003
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फसाना बुनता हूँ प्यार का, फंसाना नहीं जानता हूँ।
फसाना बुनता हूँ प्यार का, फंसाना नहीं जानता हूँ।
इरादे नेक है दिल के, पर अंदाज क्यों है गलत जिंदगी का।
गुजर जाना चाहता हूँ बंदगी करते करते, फिर भी संवर पाता नही हूँ।
हाल है कुछ ऐसा जीवन का, जैसे पानी में रहकर प्यासी है मीन।
दीन हो गया हूँ तेरे प्यार में, मस्ती फिर क्यों नहीं आती।
तकता हूँ सुनी आँखो से रात दिन तुझे, क्यों नजर आये तू।
बुला ले तू मुझे पास अपने, या चला आ तू मेरे पास।
अंजामों को बहुत भोगा, अब तो पिला दे तेरे प्यार का जाम।
आवाज रुंध रही है गले में, जैसे श्वास भी अटक रही हो।
प्यार में तेरे दिल फड़फड़ाके, दिन गिन रहा हूँ जिंदगी के।


- डॉ.संतोष सिंह