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Hymn No. 2669 | Date: 29-Jun-2003
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माँ की धुनो पे धड़कने लगा मेरा दिल, सुरों के मोती लड़ियों में पिरोने लगा।
माँ की धुनो पे धड़कने लगा मेरा दिल, सुरों के मोती लड़ियों में पिरोने लगा।
खनक गूंजे अंतर में, दुनियावी ख्वाबों में देंखूँ माँ की मस्ती साक्षात स्वरूपों में।
रोके न रूकूँ कहीं भी थिरक उठूँ, अनायास यादों से उसके जो घिर जाऊँ।
समझाये समझ में न आये, ये मस्ती जो आये परम् प्यार के छोर से।
एक एक करके सारे डौर टूटने लगे, जो उसके परम प्रेम डोर में बंधने लगा।
सच पूछो तो चलता नहीं जोर अपने आप पे, विरह के काँटे करते रहते ताजा प्रेम के घावो को।
सिलसिला चलाये रखना तू सदा, टूटने न देना अंतिम श्वासों के खत्म होने पे।
गीतों के जोर से बनाऊंगा तुझे अपना, तुझमें ही देंखूँगा जिंदगी के सारे ख्वाबों को।
अंत हो जाये अंतहीन विरह का, मिलन हो अब अनंत कालों तक का।
- डॉ.संतोष सिंह
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अब हमको न रोक पाओगे, चाहते हुये गले लग जाओगे।
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