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Hymn No. 2674 | Date: 06-Aug-2003
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क्यों चलते चलते कदम, रुक जाते है तेरी और।
क्यों चलते चलते कदम, रुक जाते है तेरी और।
क्यों याद करते करते भटक जाता हूँ माँ कही और।
क्यों प्रार्थना के मध्य में सताने लगती है जीवन की चिंता।
क्यों सर्वस्व सौंपने के बाद, बाते करता हूँ बचपन की।
क्यों भुला नही पाता हूँ, खुद को माँ तेरे ध्यान में।
क्यों अब तक अधूरा हूँ माँ, पूर्ण सद्गुरू के साथ रहके।
क्यों रोनां रोता हूँ, अपनी फरियादों को अधूरा देखके।
ये कैसा खेल है, जो हर दम पे दम निकाले जिंदगी का।
बंदगी करते करते कर जाना चाहा तेरा चाहा न तुझसे दूर होके।
क्यों मजा आता नही है, माँ तेरी रजा को पूरा करने में।


- डॉ.संतोष सिंह