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Hymn No. 2672 | Date: 16-Jul-2003
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बुझनें न दे दिल में जलते हुये प्यार के चिराग को।
बुझनें न दे दिल में जलते हुये प्यार के चिराग को।
उभरे जो भी राग जिंदगी में, मिट जाये प्यार के प्रकाश में।
तुझसे पाया हूँ, तुझमें ही खोना चाहता हूँ, दुनिया में आके तेरा हो जाना चाहता हूँ।
जिसका अस्तित्व नहीं कभी भी, तो क्यों लोभ करने लगा मैं उसका।
मैं तो आया हूँ तेरे सहारे, तेरे प्यार के रंग में रंगने के वास्ते।
अचानक क्यों हाथ छुड़ाके तू जाने लगा, क्या हद कर दी है हमने।
क्या इसलिये साथ रखके न रखा साथ तूने, कि तुझे विश्वास न था हमपे कभी।
ये सच है हमने भी न किया विश्वास खुद पे, पर तुझपे अटल विश्वास जरूर है।
मेरी नियति ही मेरी हकीकत है, तेरी रजा से तो हमको कबूल है।
जाते हो तो जाओं यार अनंत के सफर पे, पर मेरे प्रेम को लेते जाओ।


- डॉ.संतोष सिंह