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Hymn No. 2679 | Date: 14-Aug-2003
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प्यार प्यार और प्यार तेरे सामने रहते प्यार के सिवाय कोई बात कैसे आये दिल मैं।
प्यार प्यार और प्यार तेरे सामने रहते प्यार के सिवाय कोई बात कैसे आये दिल मैं।
कर्मों का हूँ शिकार प्यार, या तेरे प्यार का बीमार, मिलता है मन को सकून तेरे पास ही रहके।
फिक्र किसे है कुछ की, तेरे सिवाय जिक्र न है किसीका, हर बात हर पल करना चाहू तुझसे।
ख्यालात हो या सवालात मन के, जवाब ढूंढ़ता हूँ सारे प्रभु तेरे प्यार में हम।
जला कई बार फिर भी कम फूंक फूंकके कदम न रखना आया, तुझे देखते ही दौड़ा बेंतहशा तेरी और।
चले दौर कोई भी जिंदगी का, शिकायत न है किसी से, जो भी बात है मेरी उसे सुनाना चाहूँ तुझे।
अंत न हो जो मेरे कर्मों का, तो अंतहीन बना दे मेरे प्यार को, पल मैं सिमट जाऊँगा मैं तुझमें।
न है कुछ तुझे बताना, न ही है कुछ तुझे सिखाना, तेरे सामने रहते कह जाता हूँ मैं सब कुछ अपना।
रहके दुनिया मैं रहूँ पास तेरे, तेरा कहा करते मशगूल रहूँ तेरे प्यार की मस्ती मैं।
मिट जाये मेरी हस्ती, तेरे संसार के जीवन चक्र मैं, उससे पहले प्यार के खूशनुमाँ क्षण बनके समा जाऊँ तेरे दिल मैं।


- डॉ.संतोष सिंह