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Hymn No. 2681 | Date: 16-Aug-2003
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भग्न हृद्य है टूटा हुआ मन है, मौन मैं मुखरित होते कई विचार।
भग्न हृद्य है टूटा हुआ मन है, मौन मैं मुखरित होते कई विचार।
प्रभु तेरे पास पहुँचके, अब तक क्यों वंचित हूँ तेरे अमर प्रेम से।
अधूरा इंसान तो सदा से है, पूरा तुझे पाके ही होता है।
तेरे सिवाय न कोई सच्चा ठिकाना, बेगानो के सिवाय न है कोई अपना।
सपनो के जैसी झूंठी दुनिया मैं, पानी के बुलबुले जैसी जिंदगी है।
सब जानके भी क्यों न करता हूँ प्रयास सच्चा, यंत्रवत्, दुनिया मैं क्यों हूँ यंत्रवत् जिदा।
ये शिकायतों का न ढेर है, पर मन के ही ख्यालात है।
न चाहते हुये न जाने कब घसीट देते है, तेरी और बढ़ते कदमों को रोक देते है।
हर बार तोड़ इस इंद्रजाल को, उतना ही अंदर फंसा पाया अपने आपको।
ना तू मदद करेगा तो कौंन करेगा, तेरी कृपा से मोह का जाल टूटेगा।


- डॉ.संतोष सिंह