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Hymn No. 2682 | Date: 20-Aug-2003
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ये कैसा खेल है माँ ये कैसा खेल है तेरी माया का।
ये कैसा खेल है माँ ये कैसा खेल है तेरी माया का।
जो हर पल रुलाये जिंदगी मैं, रहूँ चाहे तेरे कितना भी साये में।
बहुत समझाऊँ दिल को, समझते हुये हार जाऊँ हालातों के आगे।
माँ मैं तो हूँ निर्भर पूरी तरह तेरे ऊपर, न है कोई दूजा तेरे सिवाय।
लाख चाहा न टेकूँ घुटने, उसी पल झुका माँ मैं तेरे रहते।
खान हूँ मैं कमियों की, बैरंग सी जिंदगी मैं अंजाम है मुसीबतों का।
एक के बाद एक न जाने कितनी दुश्वारियों, न ले अंत खत्म होने का।
दुःख तो सबसे बड़ा है ये मेरा, नाकामियों का दाग चस्पाये मुझपे।
कब होगा, खत्म पराजय का, खेल कब करुँगा साकार तेरे सपनों को।
डर जाता हूँ कुछ होशियारी भरी बातें करने से, परिणामों की परवाह करते हुये।
- डॉ.संतोष सिंह
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भग्न हृद्य है टूटा हुआ मन है, मौन मैं मुखरित होते कई विचार।
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एक बार माँ एक बार तू कर मुझपे तेरी प्रेम भरी कृपा, भवसागर से पार लगा दे नैया मेरी।
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