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Hymn No. 2686 | Date: 28-Aug-2003
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एक बार फिर से तू आ जा, आके रास रचा जा साथ हमारे।
एक बार फिर से तू आ जा, आके रास रचा जा साथ हमारे।
न जाने कितना वख्त बीत गया, फिर भी सूनी आखें राह तकते थकती नहीं।
हर आहट पे धड़कता दिल हमारा, कि कहीं तू तो नहीं आया।
लाख समझाया मन को, पर दिल को जरा भी विश्वास न हो हमपे।
वख्त पे वख्त जैसे जैसे बीता जाये, लगे अंतर को मिलन का वख्त करीब आये।
ये कैसा दौर है जीवन का, जो तेरे न रहने पे क्या समझाना चाहे जीवन को।
ये कैसी राह है प्रेम की, जहाँ मिलन के बाद विरह होता है प्रियतम से।
बातों ही बातों मैं बतियाने लग जाता हूँ अपने आप से, जैसे जवाब तू देता हो दिल मैं।
हंसी होने लगी है अब मेरी दुनिया मैं, जो हकीकत से भरी दुनिया मैं ख्वाब देखूँ तेरे प्यार के।
तू कर दे पूरी अब मेरी सजा, अंतिम श्वास तक बजाऊंगा तेरे हुक्मों को।
- डॉ.संतोष सिंह
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