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Hymn No. 2704 | Date: 08-Oct-2003
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सुनो, सुनो, सुनो सुनाना चाहता हूँ तुझे अपनी बात।
सुनो, सुनो, सुनो सुनाना चाहता हूँ तुझे अपनी बात।
सुनना नहीं चाहा कभी तेरा, इतना था मैं बेहोशी मैं डूबा।
और जब भी कुछ सुना, तो भी न कर सका कहा तेरा।
कारण जो भी हो, अजीब हूँ अपनी बदकिस्मती का जिम्मेदार खुद हूँ।
देना चाहा न जाने कितना कुछ, मौका चुका हर बार न जाने क्यों।
राग अलापा अपनी बदकिस्मती का, देखा न अपने कर्मों को।
समय चूकता गया, रोना रोया समय न आने का।
बहुत चाहा निकल जाने को, पर छटपटाहट में और फंसता गया।
साया बनके रह गया मैं का, मैं से परे हो न सका।
फिर भी कायम है आस, कल नहीं आज जो बनूंगा सच्चा तेरा दास।
न होगी कोई ओर फरियाद, तेरे ख्वाबों ख्यालों मैं जो डूबा रहूँगा।
- डॉ.संतोष सिंह
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न मैं किसी को मानूँ, न ही मैं किसी को जानूँ, तेरे सिवाय बस तुझको ही मांनू।
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पुकार कब तक करेगा अनुसुनी, तू मेरी, कह ले तू कितना भी कुछ सुनता है तू जरूर।
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