VIEW HYMN

Hymn No. 2708 | Date: 09-Oct-2003
Text Size
कह लो यारो कुछ भी तुम, कहने से गुरेज न है हमको।
कह लो यारो कुछ भी तुम, कहने से गुरेज न है हमको।
तुम्हारा कहना अक्षरशःसही है, पर हमको गवारा लगता नहीं है।
जब होता हूँ अपने अहं मैं, सच मुह चुराके मैं जीता हूँ।
चाहा लाखों बार कहा करना तेरा, चाहा हुआ कर न पाया।
सताये दुनिया औरों को, हम तो सताये हुये है खुद के।
चुराऊँ नजर दर्पण से, जो दिखाये सीरत हमारी हमको।
ताल ठोक के कूदा अखाड़े मैं, कूदते ही पट्टखनी खाया।
चाहा था बनके जीना तेरा, साया ने भी पीछा छुड़ाया हमसे।
गजब हूँ मैं जो ठोकर खाके जीना न सीखा, कहलाया हर बार झुठा।
कैसे कहूं मैं खुद को तेरा, तेरा दिया हुआ भी सजो न पाया।


- डॉ.संतोष सिंह