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Hymn No. 267 | Date: 09-Aug-1998
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एक तू ही तू है प्रभु, दूसरा कोई नहीं, सच – सच होता है, कीसी भी झूठ से झूठलाया नहीं जा सकता ।
एक तू ही तू है प्रभु, दूसरा कोई नहीं, सच – सच होता है, कीसी भी झूठ से झूठलाया नहीं जा सकता ।
माटी का तन है, माटी में ही जा मिलता, जो आज जनमा तय है उसका मरना खुद को भी तूने उस नियत में बाँधा ।
कैसे मानूँ उन थोथी मान्यताओं को, जिसमें तुझको है लोगों ने बांधा, अलग – अलग नियम हैं अलग – अलग रूपों के लिये, तो क्यो चिपकूँ कीसी एक से ।
तू स्वीकार करता है सबको चाहें वो अच्छा हो या बुरा, दर खुला है तेरा सबके लिये सदा;
क्यों मैं गाठ बांधु मन में अपने कीसी के लिये ।
करमों का भार ढोना पड़ता है हर एक को, रोनें से ना है कुछ फायदा, करते वक्त जब ना सोचा तो अब बढ़के कबूल करना है अपनी सजा को ।
खुद्दारों के आगे चला आता है वो, प्रेमियों के प्रेम में भूलाता अपने आपको, मिटनें पे जो तुले है उसकें लिये, उधार ना रखता कभी उनका मिटना ।
जीता है उसने सबको, यहीं मौका देता है हमको, दिलवालों का है कद्रदान वो।
राज की बात ये है उससे बडा कोई ना है दिवाना ।


- डॉ.संतोष सिंह