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Hymn No. 2711 | Date: 09-Oct-2003
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दिल ही दिल मैं लगी है आग, जो जले ओर जलाये हर पल तड़पाये।
दिल ही दिल मैं लगी है आग, जो जले ओर जलाये हर पल तड़पाये।
बहुत चाहा बच पाना उतनी ही भड़कती जाये, चाहे तू रहे पास या दूर।
मतलब न है कुछ, अंदर ही अंदर यादों से घिरके सुलगती जाये।
आँसु करे घी का काम, प्यार की धुन को विरह और भड़काती जाये।
गुजारिश न करता हूँ बचने की, पर देरी का रंज है, दिल जो फना होना चाहे।
तसव्वुर उसी मैं मिले मन को, उसके बिना पल मैं चैन गँवाये।
खेल है ये कैसा तेरा, जहाँ अंजाम के वास्ते पल पल देरी होती जाये।
दस्तूर है ये प्यार का, तो सुंकूँ है दिल को जो तेरे मुताबिक करता जाये।
हमने भी ठाना है तेरे आगे उफ् न करने को, होश फारव्ता चाहे हो जाये।
आज नहीं तो कल जलना हो तो क्यों न जलूं प्यार मैं तेरे हर पल।
- डॉ.संतोष सिंह
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