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Hymn No. 2716 | Date: 12-Oct-2003
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कुछ और, कुछ और, का शोर है दिल से, मन भरता नही लिख लिखके।
कुछ और, कुछ और, का शोर है दिल से, मन भरता नही लिख लिखके।
एक लिखे दूजा गुनगुनाये, चाहता हूँ सिलसिला खत्म न हो कभी।
जोर शोर से चले दौर लिखने का, लगे न दिल को छूट गया है कुछ।
फिर भी तरस न हो कम, लिखते लिखते मिट जाये जिंदगी के सार दौर।
बोध न हो लिखने का, जो लिखने में रम जायें हम इतना।
न लिखूं तो सताये पल, रह रहके याद दिलाये तेरी सारे पल।
जिंदगी मैं हो एक बात, बिना लिखे न दूं तेरा कोई जवाब।
एक के बाद दूजा आता जाये, जो मजबूर करे तुझे प्यार जताने को।
आरजू आरजू बनके न रह जाये, प्यार बनके बढ़े दिलों मैं जो लिखने मैं सिमट जाये।
होश न हो हमको लिखने का, लिखते लिखते प्यार का जिंदगी सबब बन जाये।
- डॉ.संतोष सिंह
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