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Hymn No. 2718 | Date: 13-Oct-2003
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काटों तो खून नहीं है, जिंदगी का दौर है ऐसा।
काटों तो खून नहीं है, जिंदगी का दौर है ऐसा।
बोलती बंद हो जाये, जीवन का शोर है ऐसा।
मिट गयी है पहचान, जो रह न गयी जमाने में औंकात।
डर बड़ता जाये मन में, जो खबनहार से दूर होता गया।
डूबा हुआ हूँ इतना, किसी भी पल छुट सकती है सांस।
रास न आये किसीका साथ, जो मुख मोड़ा अपनों ने।
जागना चाहा, हारा अपने ही कर्मों की वजह से।
बोलती बंद हो गयी, कैसे क्या होगा सोंच सोंचके।
बिना रोग के मर रहा हूँ, जो खाये दिन रात चिंता।
आस की एक ही किरण है, वो है नाम तेरा राम राम।


- डॉ.संतोष सिंह