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Hymn No. 2720 | Date: 18-Oct-2003
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दिल की दीवानगी है, माने न ये किसीकी।
दिल की दीवानगी है, माने न ये किसीकी।
हर हाल मैं होना चाहे तेरा, परवाह न है किसीकी।
समय पलों मैं बदलके गुजरता जाये, जोश न हो कम।
दिल ही दिल मैं तेरे प्यार के सपनो को बुनता जाये।
बातें बहुत हो चुकी है, खड़ी है तलवार सर पे कर्मों की।
फिर भी आस खत्म, न हुयी है अंतर की।
लोगों का न ध्यान है, खुद से भी अनजान हूँ।
पर दिल की तड़प बढ़ती जाये, जो अंतर को सिहराये।
सिमटे हुये दायरे को धीरे धीरे, विशालता मैं बदलते जाये।
पल पल की मुलाकातों को मिलन स्वरूप देना है।
खौफ न रह जाये कोई, जो हर डर निकल जाये मन का।
अनंत से अनंत तक के सफर मैं, स्वरूप हो कोई तन का।
बेड़ियाँ तोड़नी है तन मन की, हर हालमें तुझसे जुड़ना है।
हर बहाने से ऊपर, सर्वथा के वास्ते तुझसे एक होना है।


- डॉ.संतोष सिंह