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Hymn No. 2721 | Date: 20-Oct-2003
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अंधेरा ही अंधेरा है चारो ओर मेरे, दूर दूर तक न है उजाले की कोई किरण।
अंधेरा ही अंधेरा है चारो ओर मेरे, दूर दूर तक न है उजाले की कोई किरण।
लाख चाहा हर बार हारा परिस्थितियों के आगे, न वो सूझे, न ही अच्छी बूझ।
व्यवहार की दुनिया में जीता रहा ख्वाबों में, जब जब रोना रोया परिस्थितियों के आगे।
एक सदमे से अभी उबर न पाया, तभी लगा दूसरा सदमा थर्रायी मेरी जिंदगी।
कोई कितना सहेगा जब हाथ छुड़ये अपने, दिन ब दिन मुश्किलें बढ़ती जाये जिंदगी की।
चला था दिल की राह पे, पूरा कर न पाया हसरत अपनी और अपनों की।
दोष कैसे दूं किसीको, दोष ही दोष है मेरी सारी की सारी जिंदगी मैं।
बहुत चाहा तूने भी देना बहुत कुछ खुश न कर पाया तेरा चाहा एक बार भी।


- डॉ.संतोष सिंह