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Hymn No. 2722 | Date: 22-Oct-2003
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बंद आंखे हो या खुली आँखे, जो दिल मैं होगा प्यार तो कैसे कुछ सूझेंगा।
बंद आंखे हो या खुली आँखे, जो दिल मैं होगा प्यार तो कैसे कुछ सूझेंगा।
दे इसे कोई मगरूरियत का नाम, तो उसका भी दोष कहां।
स्थिर दम हो या बदन नांचे, मन में हो परम प्रेम की स्फुरणा तो क्या कहना।
कोई अगर होके न समझे, जिसको न हो अनुभूति वो क्या पहचाने।
बह चली अचानक आसुओं की धारा, स्थिर पलकों के पीछे हो कोई लम्हा।
बातें दुनिया कोई भी बनाये, दिल की दिल में नव प्रेमगीत गाता जाऊँ।
जब चुप्पी यों ही लग जाये, कहने को न कुछ कह पाऊँ तो जी जी मैं रम जाये।
रंगीन दुनिया भी बेनूर सी लगे, अंतर की दुनिया में उजागर हो सचमुच से भरा जीवन।
मतलब न हो कुछ से, जो होये उससे भी मतलब न रहे, मन ही मन सब बना रहूँ।
जीवन में दौर आये कोई, मन का तारतम्य् परम् से न छूटे वही तो मजिल पे पहुँचाये।
- डॉ.संतोष सिंह
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अंधेरा ही अंधेरा है चारो ओर मेरे, दूर दूर तक न है उजाले की कोई किरण।
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