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Hymn No. 2723 | Date: 22-Oct-2003
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खोता जा रहा हूँ अपने आप मैं, होके प्रभु का अविभाज्य हिस्सा।
खोता जा रहा हूँ अपने आप मैं, होके प्रभु का अविभाज्य हिस्सा।
मिटती जा रही है सारी दूरियाँ, जैसे सिमटा हुआ है सारा जहान मुझमें।
परत दर परत उधेड़ रही है माया को, जो जीवन के सत्य को छुपाये हुये है।
सिलसिला अनवरत जारी है, परम प्रेम का नशा जो दिल पे तारी है।
झिंझोड़ कर रख देता है, जब अपने आपको भुलाके दुनिया मैं जीता हूँ।
सब कुछ जीवन में होते हुये, अचानक अधूरेपन का अहसास होता है दिल को।
जागते हैं न जाने कितने सवाल, एक ही जवाब सबका दिल को मिलता है।
खोजता हूँ उसी पल प्यार की किरण में, परम पिता रूपी सत्य के प्रकाश को।
तारनहार सबका तू ही है, तेरे सिवाय कैसे पुकारूँ में ओर किसी को।
धीरे धीरे बढ़ता हूँ कुछ याद करते हुये, लड़खड़ाते ही गुहार लगाता हूँ तेरी दया की।


- डॉ.संतोष सिंह