VIEW HYMN

Hymn No. 2725 | Date: 27-Oct-2003
Text Size
अनवरत् के खेल में अनवरत् के रंग मैं रंग जाना चाहता हूँ।
अनवरत् के खेल में अनवरत् के रंग मैं रंग जाना चाहता हूँ।
मन के सारे आयामों को विराम देते हुये तेरे रंग मैं रंग जाना चाहता हूँ।
एक से एक आये गये तेरा बनके तुझमें समाते गये, उस पात्र को दोहराना चाहता हूँ।
अनवरत् का खेल खेले तू, जब तक हर तन कण ढल न जाये तेरे रंग में ।
पर है तू सबमें रच बसके, समझे समझाये जग मैं संत अवतारी बनके।
कोई जोर नहीं, कोई शोर नहीं, हर एक है स्वतंत्र करने को अपने मन की।
सानी नही संसार मैं तेरा, अच्छा बुरा दोनों को एक ही नजरों से देखता।
जब तक परे नही हुआ तक तक दौर चले जिंदगी का, वाह आह में भेद है मन का।
तार ले या मार दे तेरी मर्जी के आगे, किसीका जोर नहीं है चलता।
कर्मों को हमारे भाग्य का नाम देता, सच्चे संमर्पण पे हर दौर से उबारता।


- डॉ.संतोष सिंह