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Hymn No. 2734 | Date: 31-Oct-2003
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चाहत मेरी अब भी न मरी है, जेहन में रहके पल पल कौंधती है।
चाहत मेरी अब भी न मरी है, जेहन में रहके पल पल कौंधती है।
अंजाम पाना चाहे मजनू का, हर हालातों में तेरी सजदा करना चाहे।
भगा दूंगा अपने आप, भागा नहीं हूँ कभी भी प्रभु तुझसे।
ये रूसवाई कैसी है, जो दुश्वार करती जा रही हैं जीना मेरा।
औकात न थी, तो क्यों तूने दिया, सौगात में तेरे प्यार को।
हम तो जानते न थे, तो तू क्यों जानके अनजान बना हुआ था।
हमारी भलाई है गर तेरी जुदाई, तो ऐसे कैसे किस्मत को तूने गढ़ा।
कर्मों के आगे मजबूर होके, क्यों हमको दूर अपने आप से करे।
जो भी हो गढ़ जाऊँगा एक बार नहीं कई बार, पर तेरे नगमों को गाऊँगा।
जिस प्यार को जाना न था, उस प्यार को पाया हूँ शिद्दतों के बाद।


- डॉ.संतोष सिंह