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Hymn No. 2737 | Date: 04-Nov-2003
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गुनगुना रहा हूँ धिर - धिरके यादो मे तेरे,
गुनगुना रहा हूँ धिर - धिरके यादो मे तेरे,
रह - रहके गा रहा हूँ प्यार के गीतों को तेरे।
मुस्करा उठता हूँ, देख देखके ख्यालों मैं अपने,
सुलझा जाते है जो सारे जिंदगी के सवालों को मेरे।
ख्वाबों में भी बुनता है मिलने का ताना - बाना,
पलको के झपकते, पहुँचता है तू नये अंदाज मैं।
रफ्ता रफ्ता गुजरती जिंदगी में करीब आता जा रहा है,
आनंद से विभोर उठता हूँ, मिलन के पैगाम से।
लगाम न रही मेरी जिंदगी की, अब मेरे हाथों में,
जब से कसके तूने बांध लिया अपने प्रेमपाश में।


- डॉ.संतोष सिंह