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Hymn No. 2809 | Date: 05-Jul-2004
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समझ समझ के समझ पा नहीं रहा हूँ, समय रहते कुछ कर पा नही रहा है।
समझ समझ के समझ पा नहीं रहा हूँ, समय रहते कुछ कर पा नही रहा है।
तड़प तड़पके तड़पा रहे है, दिन रात न जाने किस आग मैं जलता जा रहा हूँ।
जाना बहुत कुछ, मांना कुछ नहीं, चाहते हुये करना न आया कुछ।
दांतो तले उंगलियाँ दबाये हर कोई देखे, हालात पे मेरे खुद कहकहा जो लगाऊँ।
चलने को तो न चल सके कुछ भी न जाने कैसे चुपचाप चलता चला जाऊँ।
पाने की कोई उम्मीद न है मन में, न जाने कैसे धुन में आगे बढ़ता जाऊँ।
तस्वीर धुंधली है मेरी किस्मत की, तेरी कृपा फूकेंगी प्राण उसमें।
थकते ना थकूंगा, अथक बनके अमरता को जो चूम लूंगा।
सार्थक तो तू बनायेगा, इस अनगढ़ को गढ़ रहा है जो तू अपने हाथों।
अहसास है हर पल तेरा, श्वास दर श्वास जो लेता जाये मुझे पास तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह